एक लेख ‘हिंदी’ के नाम!

भाषा बस एक माध्यम है दूसरों तक अपनी बात पहुँचाने का — वह माध्यम उस इंसान की उस भाषा पर पकड़ बतलाता है न कि उसका ओवरआल इंटेलेक्चुअल लेवल।

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मुराद — दो सालों की!

सब कहते हैं कि मेरी काफ़ी आदतें उनसे मिलती हैं और मेरी कुछ आदतों का उनसे मिलना अच्छा लगता हैं मुझे।

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रक्षाबंधन — भाई की कलाई!

मुझे किसी फैंसी धागे या मोली की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत बस उसकी कलाई की हैं! मैंने दी थी राखी उसे उस दिन भी। क्या आज उसने वह बाँधी होगी?

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